कबीरदास के दोहे – Study Material Class 10 Hindi
କବି ପରିଚୟ (कवि परिचय)
कबीरदास का जन्म सन् 1398 में काशी में हुआ था। कहा जाता है कि वे एक तालाब के किनारे मिले। एक जुलाहा दंपति ने उनका पालन पोषण किया। वे कपड़ा बुनने का काम करते थे। ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन बड़े अनुभवी थे। बुद्धि, विवेक से काम लेते थे। बहुत बातें जानते थे। वे सभी धर्मों को बराबर मानते थे। वे ईश्वर के निर्गुण, निराकार रूप को मानते थे। उस समय धर्म और समाज में बड़ी गड़बड़ी थी। कबीर ने अपनी वाणी से उसे दूर करने का प्रयास किया। लोगों में जाति-पाँति, ऊँच-नीच का भेद भाव था। विभिन्न धर्मों के अनुयायी आपस में झगड़ते थे। बाह्य आडंबर, अंधविश्वास फैल गया था। कबीर जाति भेद, मूर्त्ति पूजा, बाहरी आडंबर आदि का विरोध करते थे। वे कहते थे कि सब मनुष्य बराबर हैं। वे बाहरी धार्मिक कर्म काण्ड की अपेक्षा भक्तिभाव पर बल देते थे। वे तीर्थ व्रत, जप-तप, मूर्त्ति-पूजा आदि बाहरी काम छोड़ सच्चे दिल से भगवान की भक्ति करने को कहते थे। वे सदाचार, सच्चाई, भाईचारे, धार्मिक सहिष्णुता का प्रचार करते थे। कबीर का व्यक्तित्व सादा-सीधा पर बड़ा प्रभावशाली था। उनकी वाणियों को उनके शिष्यों ने 'बीजक' नामक ग्रंथ में संगृहीत किया। उनकी भाषा मिश्रित खड़ीबोली है, जो उस समय जन समाज में प्रचलित थी। वे अपने गुरु रामानंद स्वामी का बड़ा आदर करते थे।
କବି ପରିଚୟ - Odia Translation
କବୀରଦାସଙ୍କ ଜନ୍ମ ୧୩୯୮ ମସିହାରେ କାଶୀରେ ହୋଇଥିଲା। କୁହାଯାଏ ଯେ ସେ ଏକ ପୋଖରୀ କୂଳରେ ମିଳିଥିଲେ। ଗୋଟିଏ ତନ୍ତୀ ଦମ୍ପତି ତାଙ୍କର ଲାଳନପାଳନ କରିଥିଲେ। ସେ ଲୁଗା ବୁଣିବା କାମ କରୁଥିଲେ। ସେ ବିଶେଷ ପାଠ ପଢ଼ିନଥିଲେ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ଅଭିଜ୍ଞ ଥିଲେ। ସେ ନିଜର ବୁଦ୍ଧି ଓ ବିବେକ ଖଟାଇ କାମ କରୁଥିଲେ ଏବଂ ଅନେକ କଥା ଜାଣିଥିଲେ। ସେ ସବୁ ଧର୍ମକୁ ସମାନ ବୋଲି ମାନୁଥିଲେ। ସେ ଈଶ୍ୱରଙ୍କ ନିର୍ଗୁଣ ଓ ନିରାକାର ରୂପକୁ ବିଶ୍ୱାସ କରୁଥିଲେ। ସେହି ସମୟରେ ଧର୍ମ ଓ ସମାଜରେ ଅନେକ ବିଶୃଙ୍ଖଳା ଥିଲା। କବୀର ନିଜ ବାଣୀ ମାଧ୍ୟମରେ ତାହାକୁ ଦୂର କରିବାକୁ ପ୍ରୟାସ କରିଥିଲେ। ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଜାତିଆଣ ଭେଦଭାବ ଏବଂ ଉଚ୍ଚ-ନୀଚ୍ଚ ଭାବନା ଥିଲା। ବିଭିନ୍ନ ଧର୍ମର ଲୋକମାନେ ନିଜ ନିଜ ଭିତରେ ଝଗଡ଼ା କରୁଥିଲେ। ବାହ୍ୟ ଆଡମ୍ବର ଏବଂ ଅନ୍ଧବିଶ୍ୱାସ ବ୍ୟାପି ଯାଇଥିଲା। କବୀର ଜାତିଭେଦ, ମୂର୍ତ୍ତିପୂଜା ଏବଂ ବାହ୍ୟ ଆଡମ୍ବରର ଘୋର ବିରୋଧ କରୁଥିଲେ। ସବୁ ମଣିଷ ସମାନ ବୋଲି ସେ କହୁଥିଲେ। ବାହାରର ଧାର୍ମିକ କର୍ମକାଣ୍ଡ ଅପେକ୍ଷା ସେ ଭକ୍ତିଭାବ ଉପରେ ଅଧିକ ଗୁରୁତ୍ୱ ଦେଉଥିଲେ। ତୀର୍ଥ, ବ୍ରତ, ଜପ-ତପ, ମୂର୍ତ୍ତିପୂଜା ଆଦି ଛାଡ଼ି ସଚ୍ଚା ହୃଦୟରେ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଭକ୍ତି କରିବାକୁ ସେ ଉପଦେଶ ଦେଉଥିଲେ। ସେ ସଦାଚାର, ସତ୍ୟତା, ଭାଇଚାରା ଏବଂ ଧାର୍ମିକ ସହିଷ୍ଣୁତାର ପ୍ରଚାର କରୁଥିଲେ। କବୀରଙ୍କ ବ୍ୟକ୍ତିତ୍ୱ ସରଳ ଥିଲା କିନ୍ତୁ ବହୁତ ପ୍ରଭାବଶାଳୀ ଥିଲା। ତାଙ୍କ ବାଣୀଗୁଡ଼ିକୁ ତାଙ୍କର ଶିଷ୍ୟମାନେ 'ବୀଜକ' ନାମକ ଗ୍ରନ୍ଥରେ ସଂଗ୍ରହ କରିଥିଲେ। ତାଙ୍କର ଭାଷା ଥିଲା ମିଶ୍ରିତ ଖଡ଼ୀବୋଲୀ, ଯାହା ସେହି ସମୟରେ ସାଧାରଣ ଲୋକଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରଚଳିତ ଥିଲା। ସେ ନିଜ ଗୁରୁ ରାମାନନ୍ଦ ସ୍ୱାମୀଙ୍କୁ ବହୁତ ଆଦର କରୁଥିଲେ।
ପାଠ୍ୟ ପଦ (Hindi Text)
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदै, साँच है, ताके हिरदै आप ।।
जो तोको काँटा बुबै ताहि बोय तू फूल ।
तोकु फूल को फूल है, बाको है तिरसूल ।।
धीरे-धीरे रे मना, धीरे-धीरे सब कुछ होय ।
माली सीचें सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय ।।
ହିନ୍ଦୀ ପଦର ଓଡ଼ିଆ ଉଚ୍ଚାରଣ (Pronunciation)
ସାଞ୍ଚ ବରାବର ତପ ନହୀଁ, ଝୂଠ ବରାବର ପାପ ।
ଜାକେ ହିରଦୈ ସାଞ୍ଚ ହୈ, ତାକେ ହିରଦୈ ଆପ ।।
ଜୋ ତୋକୋ କାଁଟା ବୁବୈ ତାହି ବୋୟ ତୂ ଫୂଲ ।
ତୋକୁ ଫୂଲ କୋ ଫୂଲ ହୈ, ବାକୋ ହୈ ତିରସୂଲ ।।
ଧୀରେ-ଧୀରେ ରେ ମନା, ଧୀରେ-ଧୀରେ ସବ କୁଛ ହୋୟ ।
ମାଲୀ ସୀଂଚେ ସୌ ଘଡ଼ା, ଋତୁ ଆଏ ଫଲ ହୋୟ ।।
କଠିନ ଶବ୍ଦ (Hindi to Odia Meaning)
| ହିନ୍ଦୀ ଶବ୍ଦ | ଓଡ଼ିଆ ଅର୍ଥ |
| साँच | ସତ୍ୟ |
| पाप | ପାପ / ଖରାପ କାମ |
| आप | ଈଶ୍ୱର / ଭଗବାନ |
| जाके | ଯାହାର |
| हिरदै | ହୃଦୟରେ |
| ताके | ତାହାର |
| काँटा | କଣ୍ଟା / ଅସୁବିଧା |
| बुबै | ବୁଣେ |
| ताहि | ତାକୁ |
| बोय | ବୁଣ |
| तोको | ତୋତେ |
| बाको | ତାକୁ |
| तिरसूल | ତ୍ରିଶୂଳ / କଷ୍ଟ |
| मना | ମନ |
| होय | ହୁଏ |
| सींचे | ପାଣି ଦିଏ / ସିଞ୍ଚନ କରେ |
| सौ | ଶହେ |
| घड़ा | ମାଠିଆ / କଳସ |
| ऋतु | ଋତୁ / ଉପଯୁକ୍ତ ସମୟ |
Summary in Hindi (Long)
कबीरदास जी के इन दोहों में जीवन के तीन सबसे महत्वपूर्ण उपदेश दिए गए हैं: सत्य की महत्ता, क्षमा और परोपकार की भावना, तथा धैर्य का फल।
पहला दोहा - सत्य का महत्त्व:
कबीरदास जी कहते हैं कि संसार में सत्य के समान कोई तपस्या या ज्ञान नहीं है। उसी प्रकार झूठ बोलने या मिथ्या आचरण करने के बराबर कोई पाप या बुरा काम नहीं है। जो मनुष्य हमेशा सच बोलता है, उसका हृदय निर्मल और पाप-रहित होता है। ऐसे निर्मल हृदय वाले व्यक्ति के अंदर स्वयं भगवान का वास होता है। समाज में भी सत्यवादी का सम्मान होता है और पापी का हमेशा अनादर होता है।
दूसरा दोहा - परोपकार और अच्छाई:
इस दोहे में कर्मों के फल के बारे में बताया गया है। कबीरदास जी कहते हैं कि जो तुम्हारे रास्ते में काँटे बोता है अर्थात् तुम्हारी बुराई करता है, तुम्हें उसके रास्ते में फूल बिछाने चाहिए अर्थात् उसकी भलाई करनी चाहिए। इसका परिणाम यह होगा कि तुम्हारी अच्छाई से तुम्हें अच्छा फल (फूल) मिलेगा, जबकि बुराई करने वाले को उसके बुरे कर्मों के कारण त्रिशूल (काँटा या कष्ट) ही मिलेगा। इंसान को हमेशा अपनी अच्छाई नहीं छोड़नी चाहिए।
तीसरा दोहा - धैर्य का महत्त्व:
कबीरदास जी अपने मन को समझाते हुए कहते हैं कि इस संसार में हर काम धीरे-धीरे और अपने सही समय पर ही होता है। इसके लिए धैर्य रखना बहुत जरूरी है। उदाहरण के लिए, यदि कोई माली किसी पेड़ में सौ घड़े पानी भी एक साथ सींच दे, तो भी उसमें समय से पहले फल नहीं लग सकते। जब सही ऋतु (मौसम) आती है, तभी पेड़ में फल लगते हैं। इसलिए मनुष्य को अपने कर्म करते रहना चाहिए और सही समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
Summary in Odia (Long with Emojis)
କବୀରଦାସଙ୍କ ଏହି ଅମୂଲ୍ୟ ବାଣୀରେ ଆମ ଜୀବନ ପାଇଁ ତିନୋଟି ବହୁତ ବଡ଼ ଶିକ୍ଷା ରହିଛି: ସତ୍ୟର ମହତ୍ତ୍ୱ 🌟, ପରୋପକାର ବା କ୍ଷମାଶୀଳତା 🤝 ଏବଂ ଧୈର୍ଯ୍ୟର ଆବଶ୍ୟକତା ⏳।
ପ୍ରଥମ ଦୋହା - ସତ୍ୟର ମହତ୍ତ୍ୱ (The Power of Truth) 😇: କବୀର କହୁଛନ୍ତି ଯେ ଏହି ଦୁନିଆରେ ସତ୍ୟ କହିବା ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ତପସ୍ୟା ଅଟେ। ସତ୍ୟ ସହିତ ସମାନ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଜ୍ଞାନ ନାହିଁ ଏବଂ ମିଛ କହିବା ସହିତ ସମାନ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ପାପ ନାହିଁ 🚫। ଯେଉଁ ବ୍ୟକ୍ତି ସର୍ବଦା ସତ୍ୟ କହେ, ତାର ହୃଦୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନିର୍ମଳ ଓ ପାପମୁକ୍ତ ହୋଇଥାଏ। ଆଉ ସେହିଭଳି ପବିତ୍ର ହୃଦୟରେ ସ୍ୱୟଂ ଭଗବାନ ବାସ କରନ୍ତି 🙏। ଜଣେ ସତ୍ୟବାଦୀ ଲୋକ ସମାଜରେ ସବୁବେଳେ ସମ୍ମାନ ପାଇଥାଏ।
ଦ୍ୱିତୀୟ ଦୋହା - କ୍ଷମା ଓ ଭଲ କାମ (Forgiveness & Kindness) 🌸: ଏହି ଦୋହାରେ କର୍ମଫଳ ବିଷୟରେ ବୁଝାଯାଇଛି। କବୀର କହୁଛନ୍ତି, ଯଦି କେହି ତୁମ ରାସ୍ତାରେ କଣ୍ଟା ବିଛାଏ (ଅର୍ଥାତ୍ ତୁମର ଖରାପ ଚିନ୍ତା କରେ), ତେବେ ତୁମେ ତାର ପ୍ରତିଶୋଧ ନନେଇ ତା ରାସ୍ତାରେ ଫୁଲ ବିଛାଇ ଦିଅ (ଅର୍ଥାତ୍ ତାର ଭଲ କର) 🌼। ତୁମର ଏହି ଭଲ କାମ ପାଇଁ ଭବିଷ୍ୟତରେ ତୁମକୁ ଫୁଲ ହିଁ ମିଳିବ, କିନ୍ତୁ ଯେଉଁ ଲୋକ ତୁମ ପାଇଁ କଣ୍ଟା ବୁଣିଥିଲା ତାକୁ ନିଜର ଖରାପ କର୍ମ ପାଇଁ ତ୍ରିଶୂଳ (ଭୟଙ୍କର କଷ୍ଟ) ଭୋଗିବାକୁ ପଡ଼ିବ 🔱। ତେଣୁ ନିଜର ଭଲଗୁଣ କେବେବି ଛାଡ଼ିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।
ତୃତୀୟ ଦୋହା - ଧୈର୍ଯ୍ୟର ଫଳ (The Fruit of Patience) 🌳: କବୀର ନିଜ ମନକୁ ବୁଝାଇ କହୁଛନ୍ତି ଯେ ଦୁନିଆରେ ସବୁ କାମ ଧୀରେ ଧୀରେ ଏବଂ ଠିକ୍ ସମୟରେ ହିଁ ହୋଇଥାଏ 🕰️। ବ୍ୟସ୍ତ ହେଲେ କିଛି ଲାଭ ନାହିଁ। ଉଦାହରଣ ସ୍ୱରୂପ, ଜଣେ ମାଳୀ ଯଦି ଗୋଟିଏ ଗଛ ମୂଳରେ ଶହେ ମାଠିଆ ପାଣି ଏକାସାଙ୍ଗରେ ଢାଳିଦିଏ, ତଥାପି ସେ ଗଛରେ ସମୟ ପୂର୍ବରୁ ଫଳ ଫଳିବ ନାହିଁ 🍎। ଯେତେବେଳେ ଠିକ୍ ଋତୁ ଆସିବ, କେବଳ ସେତିକିବେଳେ ଗଛରେ ଫଳ ଧରିବ 🍂। ତେଣୁ ମଣିଷ ଧୈର୍ଯ୍ୟର ସହ ନିଜ କର୍ମ କରିବା ଉଚିତ୍ ଏବଂ ସଠିକ୍ ସମୟକୁ ଅପେକ୍ଷା କରିବା ଉଚିତ୍।